शुक्रवार, 30 मई 2025

सब कुछ बचा पाना कितना कठिन होता है'

'सब कुछ बचा पाना कितना कठिन होता है''अचानक से दोनों में गहरा मौन छा गया ,होंठ पंखुरी की तरह सिहर कर रह गए कि उसे ऐसा लगा की बहुत कुछ खो देगा ,हथेलियों पर छाई पसीने की बूँदें बता रही थीं कि जैसे कोई बेहद प्रिय वस्तु हाँथ से फिसल गई हो , देर तक चुप्पी उन्हें चक्रवात की तरह घेरे रही । वो उसे देखे जा रही थी की वह कुछ बोले,इधर उसमे एक घबराहट भर कंपन था आखिर लरजते हुए होंठों से उसने एक लंबी सांस छोड़ दी,मानो त्याग दिया हो अंदर की ऊहापोह और बैचेनी को । उँगलियाँ बेंच पर घुमाते हुए उसने कहा ,''हाँ !बहुत मुस्किल है सब कुछ बचा पाना ,शायद कुछ भी बचा पाना बहुत मुश्किल लगता है ,हमारे हाथों में एक मुट्ठी रेत है ,जो धीमे-धीमे रिस रही है ,जो इंतज़ार नहीं करती मुट्ठी खुलने का ,और अंत में मुट्ठी बंद कीये रहने के बाद भी जब मुट्ठी खोलेंगे ;हम पाएंगे बहुत कुछ फिसल चुका है ,हथेली पर रह जाएगी इतनी रेत कि लगता रहेगा की 'यहाँ रेत थी'जैसे जाने वाले के कदमों की आहट,जैसे उंगली में बची छुअन ,जैसे नदी के बह जाने पर बची हुई नदी ,जैसे बुझी हुई बाती आभास देती है दीपक के जलने का । जैसे बहुत कुछ बचा रहता है वैसे ही बचे रहेंगे हम ..थोड़े.. तुम में थोड़े हम में .. हाँ शायद जब भी सब कुछ बचा पाना कठिन होता है, तो उसे त्यागना आसान हो जाता है जिसको तुम बेहद अज़ीज़ हो ,क्योंकि जो साथ रहने की आकांक्षा को समझता आया है ,रहा है ;न रह पाने की विवशता को भी समझेगा । अगर नि:छल भूमियों पर कोई रिश्ता बना है तो उसमें सब कुछ पा ही लेने की हूक नहीं होगी । कभी कभी पा लेने से ज्यादा जरूरी हो जाता है समझ पाना .. शायद ये विडंबना हर जगह है 'त्याग में क्यूँ निहित तृप्ति है प्रेम की' काश ये विडंवनाएँ ना होतीं ..'' फिर वही पहले वाली चुप्पी वहाँ छा गई और ये गूँजता रहा कि 'सब कुछ बचा पाना कितना कठिन होता है' 24 August 2023 00:22

सब कुछ बचा पाना कितना कठिन होता है'

'सब कुछ बचा पाना कितना कठिन होता है''अचानक से दोनों में गहरा मौन छा गया ,होंठ पंखुरी की तरह सिहर कर रह गए कि उसे ऐसा लगा की ...