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अपनी तलाश में..एक यायावर
शुक्रवार, 30 मई 2025
सब कुछ बचा पाना कितना कठिन होता है'
'सब कुछ बचा पाना कितना कठिन होता है''अचानक से दोनों में गहरा मौन छा गया ,होंठ पंखुरी की तरह सिहर कर रह गए कि उसे ऐसा लगा की बहुत कुछ खो देगा ,हथेलियों पर छाई पसीने की बूँदें बता रही थीं कि जैसे कोई बेहद प्रिय वस्तु हाँथ से फिसल गई हो , देर तक चुप्पी उन्हें चक्रवात की तरह घेरे रही । वो उसे देखे जा रही थी की वह कुछ बोले,इधर उसमे एक घबराहट भर कंपन था आखिर लरजते हुए होंठों से उसने एक लंबी सांस छोड़ दी,मानो त्याग दिया हो अंदर की ऊहापोह और बैचेनी को । उँगलियाँ बेंच पर घुमाते हुए उसने कहा ,''हाँ !बहुत मुस्किल है सब कुछ बचा पाना ,शायद कुछ भी बचा पाना बहुत मुश्किल लगता है ,हमारे हाथों में एक मुट्ठी रेत है ,जो धीमे-धीमे रिस रही है ,जो इंतज़ार नहीं करती मुट्ठी खुलने का ,और अंत में मुट्ठी बंद कीये रहने के बाद भी जब मुट्ठी खोलेंगे ;हम पाएंगे बहुत कुछ फिसल चुका है ,हथेली पर रह जाएगी इतनी रेत कि लगता रहेगा की 'यहाँ रेत थी'जैसे जाने वाले के कदमों की आहट,जैसे उंगली में बची छुअन ,जैसे नदी के बह जाने पर बची हुई नदी ,जैसे बुझी हुई बाती आभास देती है दीपक के जलने का । जैसे बहुत कुछ बचा रहता है वैसे ही बचे रहेंगे हम ..थोड़े.. तुम में थोड़े हम में .. हाँ शायद जब भी सब कुछ बचा पाना कठिन होता है, तो उसे त्यागना आसान हो जाता है जिसको तुम बेहद अज़ीज़ हो ,क्योंकि जो साथ रहने की आकांक्षा को समझता आया है ,रहा है ;न रह पाने की विवशता को भी समझेगा । अगर नि:छल भूमियों पर कोई रिश्ता बना है तो उसमें सब कुछ पा ही लेने की हूक नहीं होगी । कभी कभी पा लेने से ज्यादा जरूरी हो जाता है समझ पाना .. शायद ये विडंबना हर जगह है 'त्याग में क्यूँ निहित तृप्ति है प्रेम की' काश ये विडंवनाएँ ना होतीं ..''
फिर वही पहले वाली चुप्पी वहाँ छा गई और ये गूँजता रहा कि 'सब कुछ बचा पाना कितना कठिन होता है'
24 August 2023
00:22
गुरुवार, 6 फ़रवरी 2025
बहुत कुछ कहने की नाकाम कोशिश है कुछ न कह पाना!
औपचारिकता मुझे बहुत बोझिल महसूस होती है पता नहीं क्यों,कभी किसी के लिए औपचारिकता प्राथमिकता बन जाती है तो किसी के लिए मजबूरी। मित्रता की पहली शर्त यही है कि कोई तय शर्त नहीं होती। हृदय की अनुभूतियों पर आवरण रूपी बेसन लगाके तलने में बहुत संकोच होता है मुझे। पता नहीं क्या शुरू करना है ख़ैर.. हर बार जब ढ़ेर सारा मज़ाक करके हम लौट रहे होते हैं उस जगह से जहाँ हमारे हृदय में अगाध प्रेम था पर हम चाह कर भी लुटा नहीं पाये, जाते समय हर बार लगता है 'यार लड़के एक्सप्रेस नहीं कर पाते न..!' पता नहीं लड़के कब इन कसौटियों पर खरे उतरने लगते हैं जहाँ कहना ज़रूरी था हमने कुछ नहीं कहा ,जहाँ नहीं बोलना था वहाँ हम बोलते रहे, रजनीश ओशो एक जगह कहते हैं कि "याद रखने योग्य सबसे महत्वपूर्ण बात यह है: किसी को मित्रों की आवश्यकता होती है क्योंकि वह अकेले रहने में असमर्थ होता है। और जब तक किसी को मित्रों की आवश्यकता है, तब तक वह अधिक मित्र नहीं बन सकता - क्योंकि आवश्यकता दूसरे को एक वस्तु बना देती है। केवल वही व्यक्ति मित्र बनने में भी सक्षम है जो अकेले रहने में सक्षम है। लेकिन यह उसकी आवश्यकता नहीं है, यह उसका आनंद है; यह उसकी भूख नहीं है, उसकी प्यास नहीं है, बल्कि उसका प्रचुर प्रेम है, जिसे वह साझा करना चाहता है।" घनानंद कहते हैं कि 'मोर पंख की आँखें देख नहीं सकती' वे सुंदर तो हो सकती हैं! कम से कम कोरी भावुकता और हृदय की स्वस्थ अनुभूतियों में इतना अंतर तो अवश्य है। वैसे भी अभिकल्पन और विज्ञापन के इस दौर में किसी को ये सब बातें अत्यधिक सतही प्रतीत हों तो भी मुझे कोई ग़ुरेज नहीं,ये सब ख़याल ऐसे ही एक के बाद एक जुड़ते रहते हैं और उनमें कोई रब्त मुझे नहीं लगता और न ही वे एक दूसरे से अलग ही लगते हैं। हर बार जब मैं ऐसे कुछ कहना चाहता हूँ तो मुझे लगता है कि जैसे मैं कोई नज़्म कहना चाहता हूँ, शायद मैं तमाम उम्र कोई नज़्म कहने की कोशिश में ही रहा हूँ जो उतरती नहीं है,बस हृदय में हूक पैदा करती है। जैसे मैं यहाँ तक आते आते ये भूल गया कि मैं क्या कहने आया था,ऐसा मेरे साथ कुछ पहले हुआ था जब मैं बनारस आया और आज मैं भूल गया हूँ कि क्यों आया था.. कई बार लिखते हुए सोचता हूँ कि उस एक को भी कुछ कहू दूँ जिसके लिए कुछ नहीं लिख रहा ,और उसे कुछ न कहूँ जिसके लिए प्रस्तावना बनाता हूँ और हर बार निहायती बेईमानी से उसकी कोई बात नहीं करता.. बहुत कुछ कहने की नाकाम कोशिश है कुछ न कह पाना!
बुधवार, 5 फ़रवरी 2025
दोस्त
शब्दकोश कितना बड़ा छलावा होता है,है न? कहते हैं भाषा हमारी भावनाओं के संचार का सर्वोत्कृष्ट साधन है लेकिन सारा शब्दकोश कैसे श्रीहीन हो जाया करता है तब जबकि हम्हें भाषा की सर्वाधिक आवश्यकता होती है ,और हम निहत्थे खड़े होते हैं,न हाथ में रथ का पहिया होता है न सामर्थ्य काम आती है,जब हम कुछ भी कहना चाहते है असफल रहते हैं तब ऐसी ही व्यर्थ सी भूमिकाएं गढ़ते हैं जिनका कोई प्रयोजन नहीं होता। बात इतनी है कि हम कुछ कहना शुरू करना चाहते हैं जिसमें पारंपरिक कुछ भी न हो ,तब यह जटिलता और बढ़ जाती है और हर बार ये दुर्वाक्य कि 'यार लड़के एक्सप्रेस नहीं कर पाते' आख़िर क्यों? किसने बनाया हमें ऐसा? हम रो नहीं सकते, दुःख नहीं बाँट सकते और खुशी भी कितना एक्सप्रेस करते हैं हर चीज का एक ही इलाज है बकचोदी । क्योंकि जैसे ही रोएंगे कोई आकर बोल देगा कितना रोते हो यार! लड़की हो क्या
"कितना रोते हो तुम यार लड़की हो क्या
कितने लड़कों को ये बानगी खा गई"
कहना नहीं है पर कहते कहते मैंने देखा है कितने ही लड़कों का अचानक से फूट पड़ना। ये फूट पड़ना इस बात का द्योतक है कि पीड़ा का कुंभ अंतस में कितना धँसा हुआ है और वजह से हम कहते नहीं, रोते नहीं पर कोई बहुत चिर परिचित कंधा मिलता है तो स्वयं में सिमटकर फूट पड़ते हैं। मेरे पास भी ऐसे कुछ कंधे हैं,अगर आपके पास हैं तो आप भी बचा लेंगे पत्थर होती इस दुनिया में स्वयं को पाषाण बनने से । आपके पास हँसने के तो बहुत साधन हैं और रोने के लिए एक कमरा । हम नहीं चाहते कि 15×15 के एक कमरे में 6 इंच की स्क्रीन पर इतनी अर्थहीन ज़िन्दगी गुज़ार दें । इससे बचने के लिए भी दुनिया में कोई हो,जहाँ बिना किसी अतिरिक्त साधन के हम हँस सकें,बिना तकिया नोचे रो सकें,और बार बार हमें ये न दोहराना पड़े 'कौन से ग़म ने हमें चाट लिया अंदर से..'
मंगलवार, 4 फ़रवरी 2025
स्वप्न काटते रहते
दिन में स्वप्न देखना कितना भयावह हो सकता है इसका भयंकर परिणाम एकदम सामने खड़ा था बाहें फैलाए..मुझे अपने पाश में झकड़ने के लिए। रात में सोते समय दोनों तरह के सपने आते हैं(अच्छे भी और बुरे भी) नींद के सपने की एक ख़ूबसूरती यह है कि वह नींद खुलते ही टूट जाते हैं..अच्छा स्वप्न होगा तो हम उसके सम्मोहन में खो जाने से बच जाते हैं और बुरा स्वप्न होगा तो उससे छुटकारा मिल जाता है,बस देर है तो आँख खुलने की या नींद टूटने की। लेकिन खुली आँखों के सपने का कोई अंत नहीं..कल्पना की उड़ान हम नहीं रोक सकते..भयावह स्वप्न और भयावह होते चले जाते हैं और मनहर स्वन और अधिक मनहर..इतने मनहर कि हम उसमें बँधते चले जाते हैं। नींद में कोई सपना या कोई सुंदर सपना टूट जाए तो हम पूरा नहीं देख पाते खुली आँखों को यह सहूलियत है कि वह इसे आगे बढ़ा सकते हैं और हम एक बार बन चुके स्वप्न को दोबारा से बनाते हैं और सुंदर.. और सुंदर..और हम इसी सुंदर में उलझते चले जाते हैं,इतना कि हमारे चारों ओर कल्पना का कैदखाना होता है । राम की तरह हम भी जानते हैं कि सोने का हिरन नहीं होता किंतु हम इस मृग मरीचिका में उलझकर उस सोने के हिरण के पीछे चले जाते हैं और हमारे वास्तविक स्वप्न किसी कोने से झाँकते हुए हमें दुत्कारते रहते हैं। कल्पना का लोक इतना आनंद देता है कि बाहर की दुनिया का भान ही नहीं रहता। मन सुंदर से सुंदर दुनिया का निर्माण कर सकता है । पर दिन तो सपने पूरे करने के लिए होता है और हम वह दिन भी सपने देखने में ख़त्म कर देते हैं।मेरी बचपन से ही एक बुरी आदत है कल्पना करने की,खुली आँखों से सपने देखने की ।स्वप्न पूरे करने की जगह सपने देखता रहता हूंँ और रात नींद से लड़ने में बीतती रहती है क्योंकि खुली आँखों के स्वप्न पीछा ही नहीं छोड़ते या कि हम पीछा छुड़ाना ही नहीं चाहते..कौन जाने,जीवन के किस अभागे क्षण में, मैंने ये जाना कि मैं कल्पना कर सकता हूँ ,शायद बहुत बलपन से..असल में जैसे-जैसे मेरी दुनिया ख़त्म होती गई मैं उसी के समानांतर एक नई दुनिया बनाता रहा । कभी अपना घर बनाता कभी मिटाता..फिर नए शुरू से सिरे से उसका निर्माण करता..कभी बगीचा बनता..कभी..पेड़ लगाता और कभी.. और कभी.. भी पूरा घर एक साथ मैं नहीं बना पाया.. हम खुली आँखों के सपने बहुत देर तक इसीलिए भी देखते हैं क्योंकि वह पूरे नहीं होते और न ही खुली आँखों में हमारी नींद टूटती है तो हम चाहते हैं कि वह पूरा हो जाए पूरा पूरा दिन पूरी पूरी रात कई दिन कई महीने साल दर साल हम एक ही सपना जीते हैं..क्योंकि हम देख सकते हैं.. अगर एक बार स्वप्न पूरा हो जाए तो शायद हमें स्वप्न से छुटकारा मिल जाए..पता नहीं कब ये चंद्रा भंग हो.. लेकिन यह स्वप्न कभी पूरा ही नहीं होता थोड़ा बनता है और हम उसे बिगाड़ देते हैं फिर से बनाने लगते हैं असल में छप्पर की जगह किसी ने ईंटे लगवा दीं पर मेरे मन का भवन अभी तक दीवार के उस पार पड़ा है मेरी राह में..घंटों तक अपनी खाली ज़मीन को निहारता रहता कि यहाँ एक दिन भवन बनाऊँगा.. यहाँ बगीचा बनाऊँगा.. यहाँ पेड़ लगाऊँगा तरह-तरह के पेड़.. फूल-बूटे..मेरा ख़ुद का बगीचा होगा.. मेरा घर होगा..मेरा अपना घर..खुली हवा आएगी आज के दौर की..और इस घर में हम लोग रहेंगे.. इस आमदोरफ़्त से हमें केवल यह घर ही छुटकारा दे सकता है। कभी यह घर पक्का होता है कभी कच्ची मिट्टी का कच्ची मिट्टी को बारिश में खो जाने का डर लगता है इसीलिए बारिश में मैं पक्का मकान बनाता हूँऔर जब बारिश बीत जाती है तब सोचता हूँ कि कच्ची मिट्टी का घर बनाऊँगा..और फिर धीरे-धीरे इस भवन में रहने वाले सारे लोग ख़त्म होते चले गए और मैं भवन बनाता रह गया ।मैं अभी भी उस खाली जमीन पर अकेला बैठा हूँ,मैं अभी भी घर बनाता हूँ पर अब इस घर में रहने के लिए कोई नहीं है..और अब ये कल्पना आगे नहीं बढ़ती ..अब यहाँ रहेगा कौन?पता नहीं क्यों लगता है कि यह भवन कभी पूरा नहीं हो पाएगा.. अब तो इसको बनाने से भी डर लगता है जिस भवन की कल्पना में ही कोई नहीं बचा उसके बनने पर पता नहीं कौन प्रलय आ जाए..
मैं आज फिर अपनी मेज पर कोहनी टिकाए सोच रहा हूं कि मैं अपनी खाली जमीन के पार एकाकी बैठा हुआ हूँ और वहाँ भी ये सोच रहा हूँ कि यहाँ एक दिन घर बनाऊँगा,और कोई बाबा चिमटा बजाते हुए मेरे सर पर हाथ रखकर चले जाते हैं..
और मन में कहीं गूँजता रहता है कि..
स्वप्न काटते रहते मुझको
और जागकर डर जाता हूँ
तुमको पास नहीं पाता हूँ
डरना क्या है मर जाता हूँ..
एक नज़्म कहने की कोशिश में.
"कलात्मक प्रक्रिया एक बार जब पूर्ण हो जाती है तो उसे दोहराया नहीं जा सकता" आधुनिकतावादी चिंतन के संदर्भ में मैंने यह पढ़ा था लेकिन यहाँ इसका आशय क्या है? मेरा मन करता है कि हर उस जगह पर एक अरसे तक बैठा रहूँ जहाँ हमारी छाया हैं,स्मृतियां हैं और वह मुस्कुरा पड़ी थी फिर आँखें नम हो आईं थीं। उसने कहा था "मैं तो वहाँ भी नहीं बैठ पाऊँगी जहाँ हम साथ बैठे थे कभी तुम आओगे तो तुम जाना उन जगहों पर जहाँ हम साथ जाते थे ।" जहाँ हम साथ जाते थे कितना मुश्किल होगा वहाँ अकेले जाना पर जब कुछ नहीं होगा तो वहाँ जाना एक शांति का अनुभव देगा,हर वो जगह हमारा तीर्थ है जहाँ हम साथ जाते थे। मेरे बस में होता तो वहाँ एक मंदिर बनवाता जहाँ हम साथ जाते थे और मंदिर भी कैसा जिसका देवता वहाँ नहीं होगा। अपने मंदिर में अपने देवता का न होना कितना दु:खद है।कभी-कभी लगता है यथास्थितिवाद ही सही है फिर सोचता हूँ कि कौन से मंदिर में उसके देवता रहते ही हैं भला। हर मंदिर में देवता की मूर्ति है देवता कहीं नहीं हैं। मंदिर बनाने वालों को भी देवता की स्थिति का कोई अनुमान नहीं होता। तब मंदिर बनाना और कठिन हो जाता है जब बनाने वाले को पता हो कि उसके देवता यहाँ नहीं रहेंगे लेकिन लोग आते रहेंगे अपने उस देवता की तलाश में जिसकी तलाश में हमने एक उम्र गुजार दी। कितना भ्रम है जिसे हम जानकर भी नहीं पा पाते लोग आरती लिए उसे खोजते फिरते हैं। मुझे उनसे क्या मुझे तो अपने देवता से मतलब है मंदिर तो स्थापत्य की निशानी है और लोग भला क्यों न आएं उन जगहों पर,जहाँ हम जाते थे वहां कोई और भी तो आता रहा होगा; सबके बस में कहाँ होता है मंदिर बनवाना पर इतना अधिकार तो है कि वह अपने देवता की तलाश कर सकें..या वहाँ बैठ कर दो आंसू बहा सकें.. शायद इसीलिए इस अंत से डर लगता है कि पूर्ण होने पर इसे दोहराने का अवसर ख़त्म हो जाएगा फिर भी हम आएंगे अपने देवता की तलाश में
तुम भी आना कभी..उन न बन सके मंदिरों की सीढ़ियों पर बैठकर हम फिर से बातें करेंगे..
बुधवार, 29 मार्च 2023
कोहबर की शर्त
गुनाहों का देवता आपने पढ़ी ही होगी,गुनाहों का देवता पढ़ते हुए अक्सर लगता था कि ऐसी मुकद्दस प्रेम कहानी भला कहाँ मिलेगी..धर्मवीर भारती अद्वितीय है .. आज भी पाठकों के मानस पटल पर सुधा और चंदर छाए रहते है .. मुझे अक्सर गुनाहों का देवता पढ़ते हुए ऐसी अन्य कहानी की तलाश रही है .. यही उत्सुकता मुझे बहती गंगा तक खींचकर ले गई..फिर उसके फितूर में बहते रहे एहि पार गंगा ओहि पार जमुना.. उसके बाद कभी शरतचंद्र के उपन्यास,बंकिम के विषवृक्ष बन गए तो कभी रवींद्र की चोखेर बाली, आँख की किरकिरी बनकर चुभती रही तो कभी बंकिम की कपालकुंडला को किसी नवकुमार ने नदी के जल में अंतर्हित होते देखा और स्वयं भी एक छलांग लगाकर जल में जा गिरा, कपालकुंडला को न पाया तो स्वयं भी जल से न निकल पाया ... यही तलाश आज कोहबर की शर्त बन गई । कोहबर की शर्त 1965 में केशव प्रसाद मिश्र द्वारा रचित उपन्यास है .. इसी पर बाद में नदिया के पार जैसी प्रसिद्ध फिल्म बनी .. इसने अभी तक मुझे कोहबर की शर्त पढ़ने से रोक रखा था,मुझे लगता था नदिया के पार कई बार देख चुका हूँ तो उपन्यास क्या ही पढ़ना .. लेकिन मैं गलत था यह फिल्म तो महज एक हिस्सा भर है इस कहानी का ..असल तो बहुत आगे है..1949 में गुनाहों के देवता के चंदर-सुधा कब 65' में और गहरे होकर चंदन-गुंजा में पर्यवसित हो गए हैं पता नहीं या फिर सब कहानियों के धागे कहीं न कहीं जुड़े हुए हैं,खैर.. जिनको ये वहम हो गया है कि वो पत्थर हो गए हैं या नहीं रो सकते तो शायद उनको कोहबर की शर्त पढ़नी चाहिए .. किताब के बारे में कुछ इसलिए नहीं लिख रहा क्योंकि आपके उत्साह और आनंद को अपने दृष्टिकोण में संकुचित नहीं करना चाह रहा और शायद बचा भी कुछ नहीं है लिखने के लिए.. या फिर मैं कुछ कह ही पाऊँ .. बचे हैं तो बस कभी न भूलने वाले चेहरे और उनकी कथा.. चेहरे जो मन ने बनाए हैं ह्रदय की कूँची से.. बचे हैं तो कुछ नाम जो कब से कभी गंगा पर नाव तो कभी सोना नदी पर दीपासत्ती का वरदान बनकर मस्तिस्क में गूंज रहे हैं..
चंदर-सुधा चंदन-गुंजा
गुंजा-ओंकार सुधा- कैलाश
चंदर-पम्मी चंदर-विनती चंदन-बाला
प्रोफेसर साहब वैद्य जी गेसू सरला दसरथ
कहीं सुधा कहती है मौजें भी हमारी हो न सकीं तूफान भी हमारा हो न सका..
तो कहीं भीषड़ उदासी में सुनाई देता है ‘ले बाबुल घर आपनो,मैं चली पिया के देश ..
और इन सबके बीच अनदेखा रह जाता है कोई रामू..
निर्मल एहसास
मंगलवार, 14 अप्रैल 2020
एक कहानी बचपन सी
..अञ्चल आये दिन घाट पर टहलने जाया करता था, बनारस के घाटों की खुशबू वही जान सकता है जिसने इसे स्वयं महसूस किया हो।अञ्चल कभी अपने दोस्तों के साथ घाट पर आता तो कभी अकेले । मैं भी कभी कभार घाट पर जाया करता था। मैं जब भी घाट पर जाता मुझे अञ्चल वहीं खड़ा मिलता मानो गंगा की लहरों से उसका बहुत गहरा नाता हो। मैंने अञ्चल के व्यक्तित्व में एक परिवर्तन महसूस किया।
जब भी अञ्चल अपने दोस्तों के साथ होता तो ऐसा लगता मानो उससे खुश व्यक्ति कोई है ही नहीं,वो उसका हंसी मजाक करना , सबको हंसाना, ठहाके लगाना , मुझे बहुत अच्छा लगता था, पर जिस दिन वह अकेले घाट पर आता तो इतना माह्यूस, गुमसुम, कहीं खोया हुआ सा, मानो गंगा की पावन लहरों से मन ही मन कोई प्रश्न कर रहा हो , इस तरह टकटकी लगाए हुए गंगा को देखता जैसे गंगा की शीतल लहरों को गिन रहा हो और उन्हें अपने अंतस में विलीन कर लेना चाहता हो,समा लेना चाहता हो। इस तरह के अञ्चल को देखकर के लगता कि कल जो खिलखिलाता हुआ अञ्चल था उसने एक मखोटा पहना हुआ था या फिर मेरी आंखों का भरम।
इस तरह से उसको देखकर के मन करता कि उसके पास जाऊं , उससे दोस्ती करूं और उससे बातें करूं ताकि ये उदासी के बादल उसके चेहरे से छट जाएं लेकिन मैं उसका एकांत भंग नहीं करना चाहता था..शायद इसीलिए वो यहां आता भी हो..
मुझे उसके बारे में जानने की बहुत उत्सुकता थी मगर कैसे जानें , मन में रह रहकर प्रश्न उठते रहते थे कि आखिर वह ऐसा क्यों है और शायद वो अपना दुःख बांटना भी नहीं चाहता था..
जो भी हो लेकिन अञ्चल बहुत अच्छा लड़का था, उसे छोटे छोटे बच्चों से बहुत प्रेम था वो उनकी मदद किए बिना नहीं राह पाता था, घाट पर चीजें खरीद खरीद कर बच्चो में बांटता ही रहता था, अञ्चल जब भी बच्चों को देखता खुश हो जाता और दो घड़ी देखने के बाद एकदम हताश हो जाता..
दरअसल बात 4 साल पहले की थी जब अञ्चल इलाहाबाद में रहता था..तब वह बहुत खुश रहा करता था क्योंकि तब उसके साथ उसकी सबसे अच्छी दोस्त दृष्टि भी होती थी। वह और दृष्टि हमेशा साथ साथ ही रहते थे, दृष्टि की उम्र 11 साल और अञ्चल 13 साल का था। दोस्ती की चलती फिरती मिसाल थे दोनों। दोस्ती ही एक ऐसा बंधन है जिसमें कोई बंधन नहीं होता एक दूसरे के लिए हमेशा तैयार रहते थे दोनों, उनको एक दूसरे की ही परवाह रहती थी...
चहचहाते हुए चिड़ियों की तरह इधर उधर फुदकते रहते थे, सच पुंछो तो अञ्चल ने हंसना चहचहाना दृष्टि से ही सीखा था, दृष्टि इतना मीठा बोलती थी कि कोई भी उसकी आवाज का कायल हो सकता था , ऐसी आवाज जिसमें मादकता नहीं थी बस मिठास ही मिठास और तीखापन तो कोसों दूर था ,दृष्टि बहुत छोटी थी इसलिए भी चंचलता से परिपूर्ण थी। वो किसी को भी रोता हुआ या उदास देखना बिल्कुल भी पसंद नहीं करती थी, उसने अञ्चल से वादा लिया था कि वो सदा खुश रहेगा बार बार यही कहा करती कि अञ्चल! तुम ऐसे ही हमेशा मुस्कराते रहना खुशियां बांटते रहना..
एक दिन दृष्टि को अचानक से दिल का दौरा पड़ा और मासूम दृष्टि इस अटैक को सहन न कर सकी और सबको हंसाने वाली दृष्टि आज सबको रुलाकर जा रही थी, अंचल की आंखों से आंसू रोके नहीं रुक रहे थे क्योंकि उसकी सबसे अच्छी दोस्त आज उससे दूर जा चुकी थी, अञ्चल को ये पीड़ा सबसे ज्यादा सता रही थी कि अच्छे लोग इतने कम दिनों के लिए इस धारा पर क्यों आते हैं..
दो साल बीत गए अञ्चल अब भी उस नन्ही सी चिड़िया की उड़ानें नहीं भूल पा रहा था जिसने अभी उड़ना सीखा भी नहीं था, अपनी बल्किनी से बाहर ना जाने क्या देखता रहता.. उसका बचपन जैसे अतीत में कहीं डूबा जा रहा था..उसके घर वालों ने सोचा कि अगर यहां रहेगा तो यूं ही बिलखता रहेगा इसलिए वे अलाहाबाद से बनारस आ गए..लेकिन इलाहाबाद की यादें लिए गंगा नदी बनारस में भी थी..
मेरे लाख पता करने पर मुझे ये मालूम हुआ।
पर आज अञ्चल ज्यादा रो रहा था, इससे पहले वह उदास जरूर रहता था लेकिन मैंने कभी उसे रोते हुए नहीं देखा था, मुझे लगा कि मेरे ये सब याद दिलाने की वजह से ही वह रो रहा है लेकिन वह इसलिए रो रहा था क्योंकि आज के दिन ही 4 साल पहले ये सब हुआ था..
मैंने उसे शांत कराया और समझाया, "तुम कहते हो कि दृष्टि तुम्हारी सबसे अच्छी दोस्त थी लेकिन मुझे लगता है कि तुम दृष्टि के अच्छे दोस्त नहीं हो, तुम उसे समझ नहीं सके,तुम उसकी बात भी नहीं मानते हो।"
उसने कहा,"आप ऐसा कैसे कह सकते हो? मैं दृष्टि की हर बात मानता था, वो मेरी सबसे अच्छी दोस्त है।"
इस पर मैंने कहा,"तो रोना धोना बंद करो क्योंकि दृष्टि को इसी से सबसे ज्यादा दुःख होगा। दृष्टि कभी किसी को उदास देखना पसंद नहीं करती थी फिर भला तुम्हें रोता हुआ वो कैसे पसंद करेगी। इस तरह खामोश रहकर तुम उसको और दुःख पहुंचा रहे हो, उसने तुमसे ये वादा लिया था कि तुम सदैव मुस्कराते रहोगे।"
दृष्टि ने कहा था,"अञ्चल तुम ऐसे ही सदैव मुस्कराते रहना.."
इसके बाद अञ्चल खुश रहने लगा क्योंकि उसने अपनी दोस्त की बात मान ली थी.. वह अब भी घाट पर आता रहता है लेकिन उस मुखौटे वाली मुस्कान के साथ नहीं और नाही घोर उदासी के बादल लेकर आता है..
अगर आप के साथ ऐसा कुछ हुआ है तो इसपर रोने से बेहतर है कि यह सोचे की वह सख्स क्या चाहता था, उसकी इच्छा क्या थी, उसकी खुशी किसमे थी, वो तुम्हें किस तरह पसंद करता था, या तुम्हें किस ऊंचाई पर देखना चाहता था, वो सख्स जो आप को सर्वाधिक प्रिय हो वह कभी नहीं चाहेगा कि आप अपना जीवन निर्मूल बना लें..दुखों का यह सिंधु तो बना ही रहता है लेकिन साथ ही सुखों कि लहरें भी उठती रहती हैं..
अतः दुखों को खुद पर हावी ना होने दें
सदैव हंसते रहिए, खुशियां बिखेरते रहिए
धन्यवाद
-निर्मल एहसास
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