मंगलवार, 4 फ़रवरी 2025
एक नज़्म कहने की कोशिश में.
"कलात्मक प्रक्रिया एक बार जब पूर्ण हो जाती है तो उसे दोहराया नहीं जा सकता" आधुनिकतावादी चिंतन के संदर्भ में मैंने यह पढ़ा था लेकिन यहाँ इसका आशय क्या है? मेरा मन करता है कि हर उस जगह पर एक अरसे तक बैठा रहूँ जहाँ हमारी छाया हैं,स्मृतियां हैं और वह मुस्कुरा पड़ी थी फिर आँखें नम हो आईं थीं। उसने कहा था "मैं तो वहाँ भी नहीं बैठ पाऊँगी जहाँ हम साथ बैठे थे कभी तुम आओगे तो तुम जाना उन जगहों पर जहाँ हम साथ जाते थे ।" जहाँ हम साथ जाते थे कितना मुश्किल होगा वहाँ अकेले जाना पर जब कुछ नहीं होगा तो वहाँ जाना एक शांति का अनुभव देगा,हर वो जगह हमारा तीर्थ है जहाँ हम साथ जाते थे। मेरे बस में होता तो वहाँ एक मंदिर बनवाता जहाँ हम साथ जाते थे और मंदिर भी कैसा जिसका देवता वहाँ नहीं होगा। अपने मंदिर में अपने देवता का न होना कितना दु:खद है।कभी-कभी लगता है यथास्थितिवाद ही सही है फिर सोचता हूँ कि कौन से मंदिर में उसके देवता रहते ही हैं भला। हर मंदिर में देवता की मूर्ति है देवता कहीं नहीं हैं। मंदिर बनाने वालों को भी देवता की स्थिति का कोई अनुमान नहीं होता। तब मंदिर बनाना और कठिन हो जाता है जब बनाने वाले को पता हो कि उसके देवता यहाँ नहीं रहेंगे लेकिन लोग आते रहेंगे अपने उस देवता की तलाश में जिसकी तलाश में हमने एक उम्र गुजार दी। कितना भ्रम है जिसे हम जानकर भी नहीं पा पाते लोग आरती लिए उसे खोजते फिरते हैं। मुझे उनसे क्या मुझे तो अपने देवता से मतलब है मंदिर तो स्थापत्य की निशानी है और लोग भला क्यों न आएं उन जगहों पर,जहाँ हम जाते थे वहां कोई और भी तो आता रहा होगा; सबके बस में कहाँ होता है मंदिर बनवाना पर इतना अधिकार तो है कि वह अपने देवता की तलाश कर सकें..या वहाँ बैठ कर दो आंसू बहा सकें.. शायद इसीलिए इस अंत से डर लगता है कि पूर्ण होने पर इसे दोहराने का अवसर ख़त्म हो जाएगा फिर भी हम आएंगे अपने देवता की तलाश में
तुम भी आना कभी..उन न बन सके मंदिरों की सीढ़ियों पर बैठकर हम फिर से बातें करेंगे..
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
सब कुछ बचा पाना कितना कठिन होता है'
'सब कुछ बचा पाना कितना कठिन होता है''अचानक से दोनों में गहरा मौन छा गया ,होंठ पंखुरी की तरह सिहर कर रह गए कि उसे ऐसा लगा की ...
-
सरोज अपने चाचा के साथ नहर पर गया हुआ था अपने जानवरों को नहलाने के लिए। रोज की भांति अपने घर के करीब पहुंचकर उसने जानवर छोड़ दिये और ...
-
'सब कुछ बचा पाना कितना कठिन होता है''अचानक से दोनों में गहरा मौन छा गया ,होंठ पंखुरी की तरह सिहर कर रह गए कि उसे ऐसा लगा की ...
-
गुनाहों का देवता आपने पढ़ी ही होगी,गुनाहों का देवता पढ़ते हुए अक्सर लगता था कि ऐसी मुकद्दस प्रेम कहानी भला कहाँ मिलेगी..धर्मवीर भारती अद्विती...

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
If u have any doubt let me know