मंगलवार, 4 फ़रवरी 2025

स्वप्न काटते रहते

दिन में स्वप्न देखना कितना भयावह हो सकता है इसका भयंकर परिणाम एकदम सामने खड़ा था बाहें फैलाए..मुझे अपने पाश में झकड़ने के लिए। रात में सोते समय दोनों तरह के सपने आते हैं(अच्छे भी और बुरे भी) नींद के सपने की एक ख़ूबसूरती यह है कि वह नींद खुलते ही टूट जाते हैं..अच्छा स्वप्न होगा तो हम उसके सम्मोहन में खो जाने से बच जाते हैं और बुरा स्वप्न होगा तो उससे छुटकारा मिल जाता है,बस देर है तो आँख खुलने की या नींद टूटने की। लेकिन खुली आँखों के सपने का कोई अंत नहीं..कल्पना की उड़ान हम नहीं रोक सकते..भयावह स्वप्न और भयावह होते चले जाते हैं और मनहर स्वन और अधिक मनहर..इतने मनहर कि हम उसमें बँधते चले जाते हैं। नींद में कोई सपना या कोई सुंदर सपना टूट जाए तो हम पूरा नहीं देख पाते खुली आँखों को यह सहूलियत है कि वह इसे आगे बढ़ा सकते हैं और हम एक बार बन चुके स्वप्न को दोबारा से बनाते हैं और सुंदर.. और सुंदर..और हम इसी सुंदर में उलझते चले जाते हैं,इतना कि हमारे चारों ओर कल्पना का कैदखाना होता है । राम की तरह हम भी जानते हैं कि सोने का हिरन नहीं होता किंतु हम इस मृग मरीचिका में उलझकर उस सोने के हिरण के पीछे चले जाते हैं और हमारे वास्तविक स्वप्न किसी कोने से झाँकते हुए हमें दुत्कारते रहते हैं। कल्पना का लोक इतना आनंद देता है कि बाहर की दुनिया का भान ही नहीं रहता। मन सुंदर से सुंदर दुनिया का निर्माण कर सकता है । पर दिन तो सपने पूरे करने के लिए होता है और हम वह दिन भी सपने देखने में ख़त्म कर देते हैं।मेरी बचपन से ही एक बुरी आदत है कल्पना करने की,खुली आँखों से सपने देखने की ।स्वप्न पूरे करने की जगह सपने देखता रहता हूंँ और रात नींद से लड़ने में बीतती रहती है क्योंकि खुली आँखों के स्वप्न पीछा ही नहीं छोड़ते या कि हम पीछा छुड़ाना ही नहीं चाहते..कौन जाने,जीवन के किस अभागे क्षण में, मैंने ये जाना कि मैं कल्पना कर सकता हूँ ,शायद बहुत बलपन से..असल में जैसे-जैसे मेरी दुनिया ख़त्म होती गई मैं उसी के समानांतर एक नई दुनिया बनाता रहा । कभी अपना घर बनाता कभी मिटाता..फिर नए शुरू से सिरे से उसका निर्माण करता..कभी बगीचा बनता..कभी..पेड़ लगाता और कभी.. और कभी.. भी पूरा घर एक साथ मैं नहीं बना पाया.. हम खुली आँखों के सपने बहुत देर तक इसीलिए भी देखते हैं क्योंकि वह पूरे नहीं होते और न ही खुली आँखों में हमारी नींद टूटती है तो हम चाहते हैं कि वह पूरा हो जाए पूरा पूरा दिन पूरी पूरी रात कई दिन कई महीने साल दर साल हम एक ही सपना जीते हैं..क्योंकि हम देख सकते हैं.. अगर एक बार स्वप्न पूरा हो जाए तो शायद हमें स्वप्न से छुटकारा मिल जाए..पता नहीं कब ये चंद्रा भंग हो.. लेकिन यह स्वप्न कभी पूरा ही नहीं होता थोड़ा बनता है और हम उसे बिगाड़ देते हैं फिर से बनाने लगते हैं असल में छप्पर की जगह किसी ने ईंटे लगवा दीं पर मेरे मन का भवन अभी तक दीवार के उस पार पड़ा है मेरी राह में..घंटों तक अपनी खाली ज़मीन को निहारता रहता कि यहाँ एक दिन भवन बनाऊँगा.. यहाँ बगीचा बनाऊँगा.. यहाँ पेड़ लगाऊँगा तरह-तरह के पेड़.. फूल-बूटे..मेरा ख़ुद का बगीचा होगा.. मेरा घर होगा..मेरा अपना घर..खुली हवा आएगी आज के दौर की..और इस घर में हम लोग रहेंगे.. इस आमदोरफ़्त से हमें केवल यह घर ही छुटकारा दे सकता है। कभी यह घर पक्का होता है कभी कच्ची मिट्टी का कच्ची मिट्टी को बारिश में खो जाने का डर लगता है इसीलिए बारिश में मैं पक्का मकान बनाता हूँऔर जब बारिश बीत जाती है तब सोचता हूँ कि कच्ची मिट्टी का घर बनाऊँगा..और फिर धीरे-धीरे इस भवन में रहने वाले सारे लोग ख़त्म होते चले गए और मैं भवन बनाता रह गया ।मैं अभी भी उस खाली जमीन पर अकेला बैठा हूँ,मैं अभी भी घर बनाता हूँ पर अब इस घर में रहने के लिए कोई नहीं है..और अब ये कल्पना आगे नहीं बढ़ती ..अब यहाँ रहेगा कौन?पता नहीं क्यों लगता है कि यह भवन कभी पूरा नहीं हो पाएगा.. अब तो इसको बनाने से भी डर लगता है जिस भवन की कल्पना में ही कोई नहीं बचा उसके बनने पर पता नहीं कौन प्रलय आ जाए.. मैं आज फिर अपनी मेज पर कोहनी टिकाए सोच रहा हूं कि मैं अपनी खाली जमीन के पार एकाकी बैठा हुआ हूँ और वहाँ भी ये सोच रहा हूँ कि यहाँ एक दिन घर बनाऊँगा,और कोई बाबा चिमटा बजाते हुए मेरे सर पर हाथ रखकर चले जाते हैं.. और मन में कहीं गूँजता रहता है कि.. स्वप्न काटते रहते मुझको और जागकर डर जाता हूँ तुमको पास नहीं पाता हूँ डरना क्या है मर जाता हूँ..

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