बुधवार, 5 फ़रवरी 2025

दोस्त

शब्दकोश कितना बड़ा छलावा होता है,है न? कहते हैं भाषा हमारी भावनाओं के संचार का सर्वोत्कृष्ट साधन है लेकिन सारा शब्दकोश कैसे श्रीहीन हो जाया करता है तब जबकि हम्हें भाषा की सर्वाधिक आवश्यकता होती है ,और हम निहत्थे खड़े होते हैं,न‌ हाथ में रथ का पहिया होता है न सामर्थ्य काम आती है,जब हम कुछ भी कहना चाहते है असफल रहते हैं तब ऐसी ही व्यर्थ सी भूमिकाएं गढ़ते हैं जिनका कोई प्रयोजन नहीं होता। बात इतनी है कि हम कुछ कहना शुरू करना चाहते हैं जिसमें पारंपरिक कुछ भी न हो ,तब यह जटिलता और बढ़ जाती है और हर बार ये दुर्वाक्य कि 'यार लड़के एक्सप्रेस नहीं कर पाते' आख़िर क्यों? किसने बनाया हमें ऐसा? हम रो नहीं सकते, दुःख नहीं बाँट सकते और खुशी भी कितना एक्सप्रेस करते हैं हर चीज का एक ही इलाज है बकचोदी ‌। क्योंकि जैसे ही रोएंगे कोई आकर बोल देगा कितना रोते हो यार! लड़की हो क्या "कितना रोते हो तुम यार लड़की हो क्या कितने लड़कों को ये बानगी खा गई" कहना नहीं है पर कहते कहते मैंने देखा है कितने ही लड़कों का अचानक से फूट पड़ना। ये फूट पड़ना इस बात का द्योतक है कि पीड़ा का कुंभ अंतस में कितना धँसा हुआ है और वजह से हम कहते नहीं, रोते नहीं पर कोई बहुत चिर परिचित कंधा मिलता है तो स्वयं में सिमटकर फूट पड़ते हैं। मेरे पास भी ऐसे कुछ कंधे हैं,अगर आपके पास हैं तो आप भी बचा लेंगे पत्थर होती इस दुनिया में स्वयं को पाषाण बनने से । आपके पास हँसने के तो बहुत साधन हैं और रोने के लिए एक कमरा । हम नहीं चाहते कि 15×15 के एक कमरे में 6 इंच की स्क्रीन पर इतनी अर्थहीन ज़िन्दगी गुज़ार दें । इससे बचने के लिए भी दुनिया में कोई हो,जहाँ बिना किसी अतिरिक्त साधन के हम हँस सकें,बिना तकिया नोचे रो सकें,और बार बार हमें ये न दोहराना पड़े 'कौन से ग़म ने हमें चाट लिया अंदर से..'

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