गुरुवार, 6 फ़रवरी 2025
बहुत कुछ कहने की नाकाम कोशिश है कुछ न कह पाना!
औपचारिकता मुझे बहुत बोझिल महसूस होती है पता नहीं क्यों,कभी किसी के लिए औपचारिकता प्राथमिकता बन जाती है तो किसी के लिए मजबूरी। मित्रता की पहली शर्त यही है कि कोई तय शर्त नहीं होती। हृदय की अनुभूतियों पर आवरण रूपी बेसन लगाके तलने में बहुत संकोच होता है मुझे। पता नहीं क्या शुरू करना है ख़ैर.. हर बार जब ढ़ेर सारा मज़ाक करके हम लौट रहे होते हैं उस जगह से जहाँ हमारे हृदय में अगाध प्रेम था पर हम चाह कर भी लुटा नहीं पाये, जाते समय हर बार लगता है 'यार लड़के एक्सप्रेस नहीं कर पाते न..!' पता नहीं लड़के कब इन कसौटियों पर खरे उतरने लगते हैं जहाँ कहना ज़रूरी था हमने कुछ नहीं कहा ,जहाँ नहीं बोलना था वहाँ हम बोलते रहे, रजनीश ओशो एक जगह कहते हैं कि "याद रखने योग्य सबसे महत्वपूर्ण बात यह है: किसी को मित्रों की आवश्यकता होती है क्योंकि वह अकेले रहने में असमर्थ होता है। और जब तक किसी को मित्रों की आवश्यकता है, तब तक वह अधिक मित्र नहीं बन सकता - क्योंकि आवश्यकता दूसरे को एक वस्तु बना देती है। केवल वही व्यक्ति मित्र बनने में भी सक्षम है जो अकेले रहने में सक्षम है। लेकिन यह उसकी आवश्यकता नहीं है, यह उसका आनंद है; यह उसकी भूख नहीं है, उसकी प्यास नहीं है, बल्कि उसका प्रचुर प्रेम है, जिसे वह साझा करना चाहता है।" घनानंद कहते हैं कि 'मोर पंख की आँखें देख नहीं सकती' वे सुंदर तो हो सकती हैं! कम से कम कोरी भावुकता और हृदय की स्वस्थ अनुभूतियों में इतना अंतर तो अवश्य है। वैसे भी अभिकल्पन और विज्ञापन के इस दौर में किसी को ये सब बातें अत्यधिक सतही प्रतीत हों तो भी मुझे कोई ग़ुरेज नहीं,ये सब ख़याल ऐसे ही एक के बाद एक जुड़ते रहते हैं और उनमें कोई रब्त मुझे नहीं लगता और न ही वे एक दूसरे से अलग ही लगते हैं। हर बार जब मैं ऐसे कुछ कहना चाहता हूँ तो मुझे लगता है कि जैसे मैं कोई नज़्म कहना चाहता हूँ, शायद मैं तमाम उम्र कोई नज़्म कहने की कोशिश में ही रहा हूँ जो उतरती नहीं है,बस हृदय में हूक पैदा करती है। जैसे मैं यहाँ तक आते आते ये भूल गया कि मैं क्या कहने आया था,ऐसा मेरे साथ कुछ पहले हुआ था जब मैं बनारस आया और आज मैं भूल गया हूँ कि क्यों आया था.. कई बार लिखते हुए सोचता हूँ कि उस एक को भी कुछ कहू दूँ जिसके लिए कुछ नहीं लिख रहा ,और उसे कुछ न कहूँ जिसके लिए प्रस्तावना बनाता हूँ और हर बार निहायती बेईमानी से उसकी कोई बात नहीं करता.. बहुत कुछ कहने की नाकाम कोशिश है कुछ न कह पाना!
बुधवार, 5 फ़रवरी 2025
दोस्त
शब्दकोश कितना बड़ा छलावा होता है,है न? कहते हैं भाषा हमारी भावनाओं के संचार का सर्वोत्कृष्ट साधन है लेकिन सारा शब्दकोश कैसे श्रीहीन हो जाया करता है तब जबकि हम्हें भाषा की सर्वाधिक आवश्यकता होती है ,और हम निहत्थे खड़े होते हैं,न हाथ में रथ का पहिया होता है न सामर्थ्य काम आती है,जब हम कुछ भी कहना चाहते है असफल रहते हैं तब ऐसी ही व्यर्थ सी भूमिकाएं गढ़ते हैं जिनका कोई प्रयोजन नहीं होता। बात इतनी है कि हम कुछ कहना शुरू करना चाहते हैं जिसमें पारंपरिक कुछ भी न हो ,तब यह जटिलता और बढ़ जाती है और हर बार ये दुर्वाक्य कि 'यार लड़के एक्सप्रेस नहीं कर पाते' आख़िर क्यों? किसने बनाया हमें ऐसा? हम रो नहीं सकते, दुःख नहीं बाँट सकते और खुशी भी कितना एक्सप्रेस करते हैं हर चीज का एक ही इलाज है बकचोदी । क्योंकि जैसे ही रोएंगे कोई आकर बोल देगा कितना रोते हो यार! लड़की हो क्या
"कितना रोते हो तुम यार लड़की हो क्या
कितने लड़कों को ये बानगी खा गई"
कहना नहीं है पर कहते कहते मैंने देखा है कितने ही लड़कों का अचानक से फूट पड़ना। ये फूट पड़ना इस बात का द्योतक है कि पीड़ा का कुंभ अंतस में कितना धँसा हुआ है और वजह से हम कहते नहीं, रोते नहीं पर कोई बहुत चिर परिचित कंधा मिलता है तो स्वयं में सिमटकर फूट पड़ते हैं। मेरे पास भी ऐसे कुछ कंधे हैं,अगर आपके पास हैं तो आप भी बचा लेंगे पत्थर होती इस दुनिया में स्वयं को पाषाण बनने से । आपके पास हँसने के तो बहुत साधन हैं और रोने के लिए एक कमरा । हम नहीं चाहते कि 15×15 के एक कमरे में 6 इंच की स्क्रीन पर इतनी अर्थहीन ज़िन्दगी गुज़ार दें । इससे बचने के लिए भी दुनिया में कोई हो,जहाँ बिना किसी अतिरिक्त साधन के हम हँस सकें,बिना तकिया नोचे रो सकें,और बार बार हमें ये न दोहराना पड़े 'कौन से ग़म ने हमें चाट लिया अंदर से..'
मंगलवार, 4 फ़रवरी 2025
स्वप्न काटते रहते
दिन में स्वप्न देखना कितना भयावह हो सकता है इसका भयंकर परिणाम एकदम सामने खड़ा था बाहें फैलाए..मुझे अपने पाश में झकड़ने के लिए। रात में सोते समय दोनों तरह के सपने आते हैं(अच्छे भी और बुरे भी) नींद के सपने की एक ख़ूबसूरती यह है कि वह नींद खुलते ही टूट जाते हैं..अच्छा स्वप्न होगा तो हम उसके सम्मोहन में खो जाने से बच जाते हैं और बुरा स्वप्न होगा तो उससे छुटकारा मिल जाता है,बस देर है तो आँख खुलने की या नींद टूटने की। लेकिन खुली आँखों के सपने का कोई अंत नहीं..कल्पना की उड़ान हम नहीं रोक सकते..भयावह स्वप्न और भयावह होते चले जाते हैं और मनहर स्वन और अधिक मनहर..इतने मनहर कि हम उसमें बँधते चले जाते हैं। नींद में कोई सपना या कोई सुंदर सपना टूट जाए तो हम पूरा नहीं देख पाते खुली आँखों को यह सहूलियत है कि वह इसे आगे बढ़ा सकते हैं और हम एक बार बन चुके स्वप्न को दोबारा से बनाते हैं और सुंदर.. और सुंदर..और हम इसी सुंदर में उलझते चले जाते हैं,इतना कि हमारे चारों ओर कल्पना का कैदखाना होता है । राम की तरह हम भी जानते हैं कि सोने का हिरन नहीं होता किंतु हम इस मृग मरीचिका में उलझकर उस सोने के हिरण के पीछे चले जाते हैं और हमारे वास्तविक स्वप्न किसी कोने से झाँकते हुए हमें दुत्कारते रहते हैं। कल्पना का लोक इतना आनंद देता है कि बाहर की दुनिया का भान ही नहीं रहता। मन सुंदर से सुंदर दुनिया का निर्माण कर सकता है । पर दिन तो सपने पूरे करने के लिए होता है और हम वह दिन भी सपने देखने में ख़त्म कर देते हैं।मेरी बचपन से ही एक बुरी आदत है कल्पना करने की,खुली आँखों से सपने देखने की ।स्वप्न पूरे करने की जगह सपने देखता रहता हूंँ और रात नींद से लड़ने में बीतती रहती है क्योंकि खुली आँखों के स्वप्न पीछा ही नहीं छोड़ते या कि हम पीछा छुड़ाना ही नहीं चाहते..कौन जाने,जीवन के किस अभागे क्षण में, मैंने ये जाना कि मैं कल्पना कर सकता हूँ ,शायद बहुत बलपन से..असल में जैसे-जैसे मेरी दुनिया ख़त्म होती गई मैं उसी के समानांतर एक नई दुनिया बनाता रहा । कभी अपना घर बनाता कभी मिटाता..फिर नए शुरू से सिरे से उसका निर्माण करता..कभी बगीचा बनता..कभी..पेड़ लगाता और कभी.. और कभी.. भी पूरा घर एक साथ मैं नहीं बना पाया.. हम खुली आँखों के सपने बहुत देर तक इसीलिए भी देखते हैं क्योंकि वह पूरे नहीं होते और न ही खुली आँखों में हमारी नींद टूटती है तो हम चाहते हैं कि वह पूरा हो जाए पूरा पूरा दिन पूरी पूरी रात कई दिन कई महीने साल दर साल हम एक ही सपना जीते हैं..क्योंकि हम देख सकते हैं.. अगर एक बार स्वप्न पूरा हो जाए तो शायद हमें स्वप्न से छुटकारा मिल जाए..पता नहीं कब ये चंद्रा भंग हो.. लेकिन यह स्वप्न कभी पूरा ही नहीं होता थोड़ा बनता है और हम उसे बिगाड़ देते हैं फिर से बनाने लगते हैं असल में छप्पर की जगह किसी ने ईंटे लगवा दीं पर मेरे मन का भवन अभी तक दीवार के उस पार पड़ा है मेरी राह में..घंटों तक अपनी खाली ज़मीन को निहारता रहता कि यहाँ एक दिन भवन बनाऊँगा.. यहाँ बगीचा बनाऊँगा.. यहाँ पेड़ लगाऊँगा तरह-तरह के पेड़.. फूल-बूटे..मेरा ख़ुद का बगीचा होगा.. मेरा घर होगा..मेरा अपना घर..खुली हवा आएगी आज के दौर की..और इस घर में हम लोग रहेंगे.. इस आमदोरफ़्त से हमें केवल यह घर ही छुटकारा दे सकता है। कभी यह घर पक्का होता है कभी कच्ची मिट्टी का कच्ची मिट्टी को बारिश में खो जाने का डर लगता है इसीलिए बारिश में मैं पक्का मकान बनाता हूँऔर जब बारिश बीत जाती है तब सोचता हूँ कि कच्ची मिट्टी का घर बनाऊँगा..और फिर धीरे-धीरे इस भवन में रहने वाले सारे लोग ख़त्म होते चले गए और मैं भवन बनाता रह गया ।मैं अभी भी उस खाली जमीन पर अकेला बैठा हूँ,मैं अभी भी घर बनाता हूँ पर अब इस घर में रहने के लिए कोई नहीं है..और अब ये कल्पना आगे नहीं बढ़ती ..अब यहाँ रहेगा कौन?पता नहीं क्यों लगता है कि यह भवन कभी पूरा नहीं हो पाएगा.. अब तो इसको बनाने से भी डर लगता है जिस भवन की कल्पना में ही कोई नहीं बचा उसके बनने पर पता नहीं कौन प्रलय आ जाए..
मैं आज फिर अपनी मेज पर कोहनी टिकाए सोच रहा हूं कि मैं अपनी खाली जमीन के पार एकाकी बैठा हुआ हूँ और वहाँ भी ये सोच रहा हूँ कि यहाँ एक दिन घर बनाऊँगा,और कोई बाबा चिमटा बजाते हुए मेरे सर पर हाथ रखकर चले जाते हैं..
और मन में कहीं गूँजता रहता है कि..
स्वप्न काटते रहते मुझको
और जागकर डर जाता हूँ
तुमको पास नहीं पाता हूँ
डरना क्या है मर जाता हूँ..
एक नज़्म कहने की कोशिश में.
"कलात्मक प्रक्रिया एक बार जब पूर्ण हो जाती है तो उसे दोहराया नहीं जा सकता" आधुनिकतावादी चिंतन के संदर्भ में मैंने यह पढ़ा था लेकिन यहाँ इसका आशय क्या है? मेरा मन करता है कि हर उस जगह पर एक अरसे तक बैठा रहूँ जहाँ हमारी छाया हैं,स्मृतियां हैं और वह मुस्कुरा पड़ी थी फिर आँखें नम हो आईं थीं। उसने कहा था "मैं तो वहाँ भी नहीं बैठ पाऊँगी जहाँ हम साथ बैठे थे कभी तुम आओगे तो तुम जाना उन जगहों पर जहाँ हम साथ जाते थे ।" जहाँ हम साथ जाते थे कितना मुश्किल होगा वहाँ अकेले जाना पर जब कुछ नहीं होगा तो वहाँ जाना एक शांति का अनुभव देगा,हर वो जगह हमारा तीर्थ है जहाँ हम साथ जाते थे। मेरे बस में होता तो वहाँ एक मंदिर बनवाता जहाँ हम साथ जाते थे और मंदिर भी कैसा जिसका देवता वहाँ नहीं होगा। अपने मंदिर में अपने देवता का न होना कितना दु:खद है।कभी-कभी लगता है यथास्थितिवाद ही सही है फिर सोचता हूँ कि कौन से मंदिर में उसके देवता रहते ही हैं भला। हर मंदिर में देवता की मूर्ति है देवता कहीं नहीं हैं। मंदिर बनाने वालों को भी देवता की स्थिति का कोई अनुमान नहीं होता। तब मंदिर बनाना और कठिन हो जाता है जब बनाने वाले को पता हो कि उसके देवता यहाँ नहीं रहेंगे लेकिन लोग आते रहेंगे अपने उस देवता की तलाश में जिसकी तलाश में हमने एक उम्र गुजार दी। कितना भ्रम है जिसे हम जानकर भी नहीं पा पाते लोग आरती लिए उसे खोजते फिरते हैं। मुझे उनसे क्या मुझे तो अपने देवता से मतलब है मंदिर तो स्थापत्य की निशानी है और लोग भला क्यों न आएं उन जगहों पर,जहाँ हम जाते थे वहां कोई और भी तो आता रहा होगा; सबके बस में कहाँ होता है मंदिर बनवाना पर इतना अधिकार तो है कि वह अपने देवता की तलाश कर सकें..या वहाँ बैठ कर दो आंसू बहा सकें.. शायद इसीलिए इस अंत से डर लगता है कि पूर्ण होने पर इसे दोहराने का अवसर ख़त्म हो जाएगा फिर भी हम आएंगे अपने देवता की तलाश में
तुम भी आना कभी..उन न बन सके मंदिरों की सीढ़ियों पर बैठकर हम फिर से बातें करेंगे..
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